त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः
इति पृष्टा हेमलेखा भर्त्रा प्रियतरेण सा ।
प्रोवाच विदुषी सम्यग् विज्ञातलोकसंस्थितिः ॥ १ ॥
शृणु वक्ष्ये प्रियतम स्थिरशान्त समादरात् ।
मनो हि मर्कटप्रायमस्थिरं सर्वदैव तत् ॥ २ ॥
यत एवं महानर्थं प्राप्तवान् प्राकृतो जनः ।
चलन्मनः सर्वदुःखनिदानं दृष्टमेव हि ॥ ३ ॥
यतः सुषुप्तौ चलनाभावाद्बिन्दति वै सुखम् ।
तस्मान्मनः स्थिरीकृत्य शृणु यत्ते ब्रवीम्यहम् ॥ ४ ॥
अनादरेण श्रुतञ्च भवेदश्रुतसम्मितम् ।
अफलं स्यात्तदत्यन्तं यथा चित्रतरुश्रयः ॥ ५ ॥
सप्तम अध्याय ॥ ७ ॥
विचार, ईश्वर तथा निष्काम उपासनाके स्वरूपका निर्णय
अपने प्रियतम पतिके इस प्रकार प्रश्न करनेपर संसारके स्वरूपको
अच्छी तरह पहचाननेवाली विदुषी हेमलेखा कहने लगी ॥ १ ॥
"प्रियतम ! स्थिर और शान्तचित्त होकर आदरपूर्वक सुनिये ।
मैं आपके प्रश्नका उत्तर देती हूँ । यह मन बन्दरकी तरह है, सदा
चंचल ही रहता है ॥ २ ॥
क्योंकि ऐसा है, इसलिये साधारण लोगोंको बड़े अनर्थोंमें फँस
जाना पड़ता है। यह देखा ही गया है कि चंचल मन ही सारे दुःखों-
की जड़ है ॥ ३ ॥
क्योंकि सुषुप्तिमें चंचलताका अभाव हो जानेके कारण ही सुखकी
अनुभूति होती है । इसलिये मैं आपसे जो कुछ कहती हूँ मनको स्थिर
करके सुनिये ॥ ४ ॥
जो बात अनादरपूर्वक सुनी जाती है वह न सुनी-सी ही होती है ।
चित्रमें बने हुए वृक्षके समान का कोई फल नहीं होता ॥ ५ ।