त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः । ८६
सदा सदागमायत्ततर्कः श्रेयः समाप्नुयात् ।
इति प्रोक्तो हेमचूडः प्रिययात्यन्तधीरया ॥ ५९ ॥
पुनः पप्रच्छ चात्यन्तविस्मितस्तां महाशयाम् ।
अहो प्रिये ते वैदुष्यमीदृशं नाविदं पुरा ॥ ६० ॥
धन्यासि त्वमहञ्चापि धन्यो यस्त्वामुपागतः ।
ब्रवीषि श्रद्धया सर्वं श्रेयःसिद्धिर्हि तत् कथम् ॥ ६१ ॥
कुत्र श्रद्धा विधातव्या कुत्र वा सा न शस्यते ।
आनन्त्यादागमानां वै विरुद्धार्थसमाश्रयात् ॥ ६२ ॥
आचार्यमतभेदाच्च व्याख्यातृमतभेदतः ।
स्वबुद्धेरनवस्थानात् किमादेयं न वापि किम् ॥ ६३ ॥
यद्यस्याभिमतं तत् स वदत्येव सुनिश्चितम् ।
अन्यच्चाप्यव्यवसितं हानिप्रदमपि प्रिये ॥ ६४ ॥
इसलिये शुष्क तर्कको सर्वथा त्यागकर जो सर्वदा शास्त्रानुसारी तर्क
करता है उसे ही कल्याणकी प्राप्ति होती है” ॥ ५८ उ०-५९ पू० ॥
अपनी अत्यन्त बुद्धिमती प्रियाके इस प्रकार कहनेपर हेम-
चूडने अत्यन्त विस्मित होकर उस उदार हृदयवाली देवीसे पूछा ॥ ५६
उ०-६० पू० ॥
“अहो प्रिये ! तुममें इतनी विद्वत्ता है—यह बात मैं पहले नहीं
जानता था । तुम धन्य हो और मैं भी धन्य हूँ, जिसे तुम्हारा सत्संग
मिला । तुम कहती हो कि सम्पूर्ण श्रेयकी सिद्धि श्रद्धासे ही होती है,
सो ऐसा कैसे हो ? ॥ ६० उ०-६१ ॥
कहाँ तो श्रद्धा करनी चाहिये और कहाँ उसे करना उचित नहीं
है ? क्योंकि शास्त्र तो अनन्त हैं और उनके अभिप्रायोंमें भी विरोध
है ॥ ६२ ॥
इसके सिवा आचार्योंमें भी मतभेद है, शास्त्रकी व्याख्या करने-
वालोंके मत भी भिन्न-भिन्न हैं और अपनी बुद्धि भी सदा एक-सी नहीं
रहती । अतः किस बातको स्वीकार किया जाय और किसे नहीं ? ॥६३॥
प्रिये ! जिस आचार्यको जो मत मान्य है उसे वह सर्वथा निश्चित
रूपसे ही कहता है तथा अन्य सिद्धान्तोंको अनिश्चित एवं हानिप्रद भी
बताता है ॥ ६४ ॥