तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
पृष्ठ 96, कुल 334 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २५ तिरुक्कुरळ 73
३. सन्यास धर्म
२५. दयालुता
२४१. सम्पत्तियों में अति विशिष्ट है दया की सम्पत्ति। धन की
सम्पत्ति तो क्षुद्र व्यक्ति के पास भी होती है।
२४२. अच्छे ढंग से अन्वेषण करके दयालुता ग्रहण करो। अनेक
प्रकार से विवेचन करने पर ज्ञात होगा कि वही एकमात्र
सहायक है।
२४३. अन्धकार-युक्त नरक में उनका प्रवेश नहीं होता जो सदय हृदय
होते हैं।
२४४. संसार के जीवों की सुरक्षा करते हुए उन पर दया-भाव
रखनेवाले को अपने प्राण-भय के साथ जीवन व्यतीत
करने का दुर्भाग्य नहीं होता, ऐसा ज्ञानी कहते हैं।
२४५. दयालु को दुःख नहीं सताता। पवन संचरित समृद्ध व
सुविशाल लोक ही इसका साक्षी है।
२४६. पुरुषार्थहीन एवं जीवन के लक्ष्य को भूले हुए व्यक्ति ही दया-
भाव रहित अधर्म कर्म में रत रहते हैं। यह ज्ञानियों का
कथन है।
२४७. जिस प्रकार निर्धनों को इस लोक में स्थान नहीं है, उसी
प्रकार निर्दयों को उस लोक में स्थान नहीं रहता।
१४८. निर्धन एक समय समृद्ध भी हो सकते हैं, पर निर्दय का जीवन
सर्वथा निष्फल व अपरिवर्तनीय होता है।
२४९. दयाहीन के धार्मिक कर्म का विवेचन करने पर वह एक
अस्थिर बुद्धि के द्वारा सत्य वस्तु के दर्शन के समान ही
ज्ञात होगा।
२५०. निर्दय व्यक्ति अपने से निर्बल व्यक्ति के सम्मुख जाते समय
उस स्थिति का विचार करे जब वह अपने से सबल के सम्मुख
होता है।
10