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सर्वकोश
तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 334 में से

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पृष्ठ 94

अध्याय २४ तिरुक्कुरळ 71
२४. यश
२३१. दान देते हुए यशस्वी जीवन व्यतीत करने से श्रेष्ठ वस्तु की प्राप्ति
मानव के लिए और कुछ नहीं है ।
२३२. प्रशंसकों का सारा कथन याचक को एक वस्तु दान में देनेवाले
पर स्थित यश ही होता है ।
२३३. महान सुयश के अतिरिक्त अन्य कोई स्थाई सम्पत्ति संसार में
नहीं है ।
२३४. पृथ्वी की सीमा में दीर्घकाल तक रहनेवाले यशस्वी कर्मों को
जो करता है, उसी की प्रशंसा देवलोक करता है, न कि
ज्ञानियों की ।
२३५. ( यश - शरीर के ) विकास के साथ - साथ ( स्थूल शरीर के )
विनाश तथा ( यश - शरीर के ) स्थायित्व- व ( स्थूल शरीर की )
नश्वरता ( के तत्व ) को विज्ञ जन के अतिरिक्त और लोग
नहीं जानते ।
२३६. जन्म लिया है तो यश के साथ जियो । अन्यथा जन्म ही न
लेना अच्छा है ।
२३७. जिन्होंने यशप्रद जीवन व्यतीत नहीं किया, वे अपने पर न
बिगड़कर निन्दकों को भला-बुरा क्यों कहें ?
२३८. (स्थूल शरीर के अवसान के पश्चात् भी) शेष रहनेवाला यश प्राप्त
नहीं किया, तो वैसा जीवन जनमात्र पर का कलंक कहा
जाता है ।
२३९. यशहीन शरीर के भार को उठानेवाली भूमि में निर्दोष सफल
उपज का ह्रास होगा ।
२४०. निष्कलंक का जीवन ही जीवन है । यशहीन का जीवन
मृततुल्य है ।

  • दूसरा अर्थ—प्रकट होना है तो यश के साथ प्रकट होवो । अन्यथा प्रकट न
    होना ही अच्छा है ।