तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २३ तिरुक्कुरळ ६9
२३. दान
२२१. निर्धन को उसकी इच्छित वस्तु देना ही दान कहलाता है।
शेष सब प्रतिफल की इच्छा से युक्त होता है।
२२२. दान लेना, चाहे मोक्ष-मार्ग के लिए सहायक भी क्यों न हो,
बुरा ही है। मोक्ष प्राप्त न होने पर भी दान देना
ही अच्छा है।
२२३. 'मै निर्धन हूँ', ऐसा किसी के व्यथा सहित कहने से पूर्व उसे
दान देने का गुण श्रेष्ठ कुल से जन्म लिये हुए व्यक्ति में
ही होता है।
' २२४. (याचना ही नहीं,) याचित होना (भी) तब तक दुखदायक है
जब तक याचक का मुख प्रसन्न न दीखने लगे।
२२५. तपस्वी की शक्ति क्षुधा-सहन में है, पर वह शक्ति क्षुधाशांत
करने के दान से निम्न कोटि की ही है।
२२६. दरिद्रों की तीव्र क्षुधा को शांत करना ही धनी का अपने
भविष्य के लिए धन-संचय का स्थान है।
२२७. सदा बाँट कर भोजन करनेवाले को क्षुधा नामक तीव्र ज्वर कभी
नहीं सता सकता ।
२२८. संचित धन का दान न करके फिर खोनेवाले कठोर-हृदय व्यक्ति
दूसरों को देने से उत्पन्न आनन्द को क्या जानते ही नहीं ?
२२९. धन की कमी को पूर्ण करने के हेतु दान दिये बिना स्वयं
अकेले खाना दरिद्रता के कारण भिक्षा माँगने से भी अधिक
दुखदायक है।
२३०. मरण से अधिक दुखद कुछ नहीं होता, पर निर्धन की इच्छित
वस्तु को न दे सकने की अवस्था में वह मरण भी सुखद
होता है।