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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

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पृष्ठ 90

अध्याय २२ तिरुक्कुरळ 67
२२. शिष्टाचार का ज्ञान
२११. जलद को प्रत्युपकार में संसार के जीव क्या देते हैं ? जलद के
समान गुणवाले सज्जन प्रत्युपकार का विचार नहीं करते ।
२१२. परिश्रम से उपार्जित सम्पूर्ण धन यथायोग्य व्यक्ति के उपकारार्थ
ही होता है ।
२१३. दूसरों का उपकार करते हुए शिष्टाचार का जीवन व्यतीत
करने के समान दूसरा श्रेष्ठ गुण न देवलोक में है और न
इस लोक में ।
२१४. शिष्टाचार के समझदार ही वस्तुतः जीवन व्यतीत करनेवाले हैं ।
शेष सब मृततुल्य ही हैं ।
२१५. शिष्टाचार युक्त जीवन के इच्छुक बुद्धिमान की सम्पत्ति जलपूर्ण
सरोवर के समान होती है ।
२१६. शिष्टाचार बरतनेवाले सद्गुणी के पास सम्पत्ति का संग्रहीत
होना मधुर फलों के वृक्ष का नगर के मध्य में फलित होने के
समान होता है ।
११७. शिष्टाचार के गुण से युक्त महान व्यक्ति के पास सम्पत्ति
संग्रहीत हो तो वह उस वृक्ष के समान होती है जिसके सभी
अंग सफल औषधि के काम आते हैं ।
२१८. शिष्टाचार के कर्त्तव्य के ज्ञानी दरिद्र अवस्था से भी उपकार
करने से नहीं चूकते ।
२१९. शिष्टाचार के सद्गुण से युक्त व्यक्ति की दरिद्रता अपने गुणानुकूल
उपकार न कर सकने की असमर्थता ही है ।
२२०. शिष्टाचार से नाश की सम्भावना हो तो वह नाश एक का
अपने को बेचकर भी प्राप्त करने के योग्य है ।