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सर्वकोश
तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 334 में से

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पृष्ठ 88

अध्याय २१ तिरुक्कुरळ 65
२१. कुकर्म से भय
२०१. सदा कुकर्म करनेवाले उद्दण्ड व्यवहार से कभी नहीं डरते,
केवल सज्जन डरते हैं ।
२०२. बुरे कर्म का फल बुरा होता है, अतः अग्नि से अधिक इससे
डरना चाहिए ।
२०३. ज्ञानियों का कथन है कि शत्रुओं को भी दुःख न पहुँचाना ही
सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है ।
२०४. भूलकर भी कोई दूसरे के पतन का कर्म न करे, अन्यथा धर्म
स्वयं उसी के पतन का विचार करेगा ।
२०५. 'मैं दरिद्र हूँ' ऐसा विचार कर (उसके निवारणार्थ) कुकर्म
न करो । अन्यथा पुनः दरिद्र होकर अति दुःख पाओगे ।
२०६. जो चाहता हो कि दुष्कर्म मुझे बाद में दुःख न पहुँचावे, वह
दूसरों को दुष्कर्म से दुखित न करे ।
२०७. भयंकर से भयंकर शत्रु से तो बच जाओगे, परन्तु दुष्कर्म का
फल सदा तुम्हारा पीछा करके सर्वनाश कर देगा ।
२०८. कुकर्म करनेवाले का पतन परछाईं के समान सदा उसके पैरों के
नीचे ही उपस्थित रहता है ।
२०९. जिसे अपने से प्रेम हो वह साधारण से साधारण दुष्कर्म को भी
सर्वथा त्याग दे ।
२१०. उसे पतन से मुक्त समझो जो अनुचित मार्ग में चलकर दुष्कर्म
नहीं करता ।
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