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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 334 में से

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पृष्ठ 82

अध्याय १८ तिरुक्कुरळ - 59
१८. निर्लोभता
१७१. अन्याय से दूसरों की अच्छी वस्तु का लोभ करना कुल का
नाश करके विभिन्न दोषों को वहीं उत्पन्न करता है।
१७२. अन्याय से लज्जित होनेवाले अन्य की वस्तु के लोभ के
कुपरिणाम को समझकर (उसके अपहरणार्थ) कभी अनुचित
मार्ग का अनुसरण नहीं करेंगे।
१७३. स्थाई आनन्द के प्रेमी क्षणिक आनन्द प्रदान करनेवाले पदार्थों के
लोभ में पड़कर कभी अधर्मनिष्ठ न होंगे।
१७४. पंचेन्द्रियजित निर्दोष व्यक्ति दरिद्र हो जाने पर भी दूसरों की
सम्पत्ति का लोभ न करेंगे।
१७५. यदि कोई किसी की वस्तु के लोभ में आकर मूर्खतापूर्ण व्यवहार
करे तो उसकी सूक्ष्म एवं विशाल बुद्धि से क्या लाभ ?
१७६. ईश्वरीय करुणा का अभिलाषी धर्म-पथ का पथिक यदि
अर्थ-लोभ से अनुचित व्यवहार का विचार करेगा तो नाशमान
होगा।
१७७. लोभवश प्राप्त सम्पत्ति से उन्नति की अभिलाषा न रखो। उसके
भोग से किसी प्रकार का लाभ सिद्ध नहीं हो सकता।
१७८. सम्पत्ति की समृद्धि का क्या साधन है? यही कि दूसरों की
सम्पत्ति का लोभ न हो।
१७९. धर्मज्ञ व निर्लोभ बुद्धि से युक्त व्यक्ति की गुण-गरिमा का
मूल्यांकन करके लक्ष्मी स्वयं उसके पास पहुँचती है।
१८०. बिना विचारे लोभवश होने से दुर्गति प्राप्त होगी। उसकी
अनिच्छा रूपी सम्पत्ति जीवन साफल्य प्रदान करेगी।