तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १६ तिरुक्कुरळ 55
१६. सहनशीलता
१५१. खोदनेवालों का भी भार जिस प्रकार पृथ्वी सहन करती है उसी
प्रकार अपने निन्दकों को सहन करना एक विशिष्ट धर्म है।
१५२. सहनशीलता सदा एक श्रेयस्कर गुण है, पर उसका विस्मरण
उससे भी अधिक श्रेयस्कर है।
१५३. दरिद्रों में दरिद्र वह है जो अतिथि का सत्कार न करे।
महानों में महान वह है जो मूढ़ के शब्दों को सह ले।
१५४. सदाचरण की स्थिरता की अभिलाषा हो तो सहनशीलता को
सदा सँभाले रहो।
१५५. किये के बदले में दुःख देनेवाले को लोग सज्जन नहीं मानते पर
सहनशील व्यक्ति को स्वर्ण के समान सुरक्षित रखते हैं।
१५६. बदले में दुःख पहुँचानेवाले को एक दिन का आनन्द भले ही
प्राप्त हो, पर सहनशील व्यक्ति का पृथ्वी के प्रलय-काल तक
सम्मान होता रहेगा।
१५७. दूसरों के द्वारा अनुचित व्यवहार किये जाने पर भी उससे दुखित
होकर बदले में धर्महीन कर्म न करना अच्छा है।
१५८. अहंकार के कारण अनुचित व्यवहार करनेवाले पर अपनी
योग्यता से विजय प्राप्त करनी चाहिए।
१५९. अनुचित व्यवहार करनेवालों के अपशब्दों को सहन करनेवाले
वस्तुतः साधुओं जैसे निर्मल हृदयवाले ही होते हैं।
१६०. उपवास का व्रत धारण करनेवालों की महानता दूसरों के
दुर्वचनों को सह लेनेवालों के बाद ही है।