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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 334 में से

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पृष्ठ 76

अध्याय १५ तिरुक्कुरळ ५३
१५. परदार-अनिच्छा
१४१. संसार में धर्म एवं धन के तत्त्वज्ञों में परदारेच्छा की मूढ़ता
नहीं होती।
१४२. अधर्मपथगामियों में अन्य स्त्री के गृह-द्वार पर प्रतीक्षा
करनेवाले के समान मूढ़ और कोई नहीं।
१४३. विश्वस्त मित्र की स्त्री के साथ कलुषित व्यवहार करनेवाले
मृत्युगत के अतिरिक्त और कोई नहीं।
१४४. कोई व्यक्ति चाहे कितना ही महान क्यों न हो, तनिक भी विचार
किये बिना परस्त्री-गमन करने से उसकी क्या दशा होगी?
१४५. अति सुलभ मानकर अन्य स्त्री पर आसक्त होनेवाला स्थाई
निन्दा का पात्र होगा।
१४६. शत्रुता, पाप, भय एवं निन्दा—ये चारों परदारेच्छुक से कभी
पृथक नहीं होंगे।
१४७. दूसरे की धर्म-पत्नी पर कभी न आसक्त होने वाला ही धार्मिक
गृहस्थ होता है।
१४८. दूसरे की स्त्री को कामेच्छा से कभी न निहारने का महान
पौरुष बुद्धिमानों का धर्म ही नहीं, मूल सदाचरण भी है।
१४९. भयंकर समुद्र के मध्य स्थित संसार में समस्त वैभवों का अधिकारी
वही है जो अन्य की अधिकृता स्त्री के स्कन्धों का आलिंगन
न करे।
१५०. धर्म की सीमा के बाहर के कर्मों को करने पर भी, परदारेच्छा से
दूर रहना अच्छा है।