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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 334 में से

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पृष्ठ 74

अध्याय १४ तिरुक्कुरळ 51
१४. सदाचरण
१३१. सदाचरण ही सब को श्री-वृद्धि प्रदान करता है, अतः उसे
प्राणों से बढ़कर मानना चाहिए।
१३२. सदाचरण की सप्रयल सुरक्षा करनी चाहिए। क्योंकि समीक्षा
करने पर वही स्थाई सहायक सिद्ध होता है।
१३३. श्रेष्ठ कुल का लक्षण सदाचरण से युक्त जीवन ही है। दुराचरण
नीच जन्म को सिद्ध कर देगा।
१३४. विस्मृत विषय का पुनः अध्ययन कर सकते हैं, परन्तु यदि
ब्राह्मण आचरण-भ्रष्ट हो गया तो उसके जन्म की प्रतिष्ठा सदा
के लिए नष्ट हो जायगी।
१३५. ईर्ष्यालु व्यक्ति की वृद्धि जिस प्रकार नहीं होती, उसी प्रकार
आचरणहीन व्यक्ति की अभिवृद्धि भी कभी नहीं होती।
१३६. दुराचरण के दोषों को समझकर दृढ़-चित्त बुद्धिमान सदाचरण की
सदा सुरक्षा करेंगे।
१३७. सदाचरण से सभी श्रेष्ठ बनेंगे और दुराचरण से अति निन्दित
होंगे।
१३८. सुखी जीवन का बीज है सदाचरण, और दुराचरण दुख ही देगा।
१३९. सदाचरण पर चलनेवाले भूलकर भी अपने मुँह से बुरे वचन
नहीं निकालेंगे।
१४०. अनेक विद्याओं का अध्ययन करके भी जो समाज के साथ
मिलकर आचरण युक्त जीवन व्यतीत करना नहीं जानते, वे
अज्ञानी ही समझे जायेंगे।