तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १३ तिरुक्कुरळ 49
१३. संयम
१२१. संशय दैवत्य प्रदान करता है और असंयम घनघोर अंधकार में
झोंक देता है।
१२२. संयम को विशिष्ट सम्पत्ति मानकर उसकी सुरक्षा करनी चाहिए
क्योंकि इससे श्रेष्ठ सम्पत्ति जीवन के लिए और कोई नहीं है।
१२३. यदि कोई संयम को ही आत्म ज्ञान मान कर उस धर्म पर चले तो
वह सज्जनों के द्वारा सम्मानित होकर श्रीवृद्धि प्राप्त करेगा।
१२४. अपनी स्थिति के अनुकूल संयम पर बिना परिवर्तन के स्थिर
रहनेवाले की ऊँचाई पर्वत से कही बढ़कर होती है।
१२५. नम्र व्यवहार सब के लिए अच्छा है, पर उसमें भी धनवानों के
लिए तो अमूल्य धन के समान होता है।
' १२६. कोई व्यक्ति एक जन्म में पंचेन्द्रिय को संयम से रखे तो उसमें
उसके सातों जन्मों में रक्षा करने की सामर्थ्य होती है।
१२७. चाहे आवश्यक विषयों में से किसी और की रक्षा न करें, पर
जिह्वा की रक्षा अवश्य करें। अन्यथा अपने अनुचित वचनों के
फलस्वरूप स्वयं दुखित होंगे।
१२८. बुरे वचनों के फलस्वरूप अन्य को दुखित करनेवाली एक बात भी
हुई तो इतर धर्मों से किसी प्रकार का लाभ नहीं होगा।
१२९. अग्नि का जला घाव तो भीतर से पूर्णतः ठीक हो जाता है,
और बाहर एक चिह्न मात्र रह जाता है। पर जिह्वा का लगा घाव
कभी अच्छा नहीं हो सकता।
१३० विद्यापार्जन के अनन्तर संयम से निष्क्रोध ही जीवन व्यतीत
करनेवाले के उचित अवसर के लिए धर्म-देवता भी प्रतीक्षा
करेंगे।
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