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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 334 में से

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पृष्ठ 70

अध्याय. १२ तिरुक्कुरळ 47
१२. मध्यस्थिति
१११. मध्यस्थता एक सुन्दर सिद्धान्त है, पर तब जब वह विभिन्न
क्षेत्रों में नियमानुकूल व्यवस्थित हो ।
११२. न केवल मध्यस्थता से युक्त व्यक्ति की सम्पत्ति कम नहीं होती,
अपितु वह उसकी सन्तति के लिए स्थाई आश्रय होकर
रहती है ।
११३. मध्यस्थता से च्युत होने पर चाहे किसी प्रकार की उन्नति भी
क्यों न प्राप्त हो, उसे उसी दम त्याग देना चाहिए ।
११४. कोई मध्यस्थता से युक्त है अथवा नही, इसका ज्ञान उसकी
सन्तति से होता है ।
११५. जीवन में उत्थान-पतन तो रहता ही है, पर मध्यस्थता ही
बुद्धिमानों का भूषण है ।
११६. हृदय मध्यस्थता को त्यागे तो समझें कि पतन होनेवाला है ।
११७. धर्म-पथ पर चलकर मध्यस्थता का निरन्तर पालन करनेवाला यदि
दरिद्र हो जाय तो संसार उसका अपमान नहीं करेगा ।
११८. सम रहकर मूल्यांकन करनेवाले तराजू के समान व्यवहार करना
ही मध्यस्थता पर चलनेवाले व्यक्ति का आभूषण है ।
११९. मध्यस्थता इसी में है कि वचन में किसी प्रकार की वक्रता न हो,
पर साथ-साथ मन में भी लेशमात्र वक्रता न हो ।
१२०. वणिक के वाणिज्य की सुन्दरता इसी में है कि वह दूसरों की
वस्तुओं को भी अपनी वस्तु के समान मान कर व्यापार करे ।