तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय. ११ तिरुक्कुरळ 45
११. कृतज्ञता
१०१. पूर्व-प्राप्त उपकार के बिना किये गये उपकार के लिए यदि भूलोक
एवं देवलोक भी दिये जायँ तो थोड़ा है ।
१०२. आवश्यक समय पर पहुँचायी गयी सहायता अल्प होने पर भी इस
पृथ्वी-लोक से बढ़कर होती है ।
१०३. व्यक्तिगत लाभ के विचार के बिना की गयी सहायता का विवेचन
करें तो वह समुद्र से भी विशाल विदित होगी ।
१०४. तृणतुल्य भी उपकार क्यों न हो, उसके फल को समझनेवाले उसे
ताड़ के समान मानेंगे ।
१०५ किसी उपकार के प्रतिरूप किया गया उपकार कभी पूर्वकृत
उपकार के समान नहीं हो सकता ; यह तो उपकृत व्यक्ति की
गुण-गरिमा के अनुसार ही होता है ।
१०६. निर्दोष व्यक्तियों का सम्बन्ध न छोड़ो । दुःख के समय जिसने
सहायता की हो उसकी मित्रता को न त्यागो ।
१०७. सज्जन वही है जो अपने पर आये हुए दुख को हटानेवाले का
सातों जन्मों में स्मरण रखता है ।
१०८. उपकार का विस्मरण उचित नहीं होता, पर अपकार को उसी दम
भूल जाना ही उचित है ।
१०९. मरण सदृश अति विषम अपकार करने पर भी, अपकारी के
पूर्वकृत एक उपकार का स्मरण उस अपकार को भुला देगा ।
११०. किसी भी धर्म से च्युत होनेवाले के लिए तो पाप-विमोचन का
मार्ग है, परन्तु कृतघ्न के लिए कोई मार्ग नहीं ।