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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 334 में से

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पृष्ठ 66

अध्याय- १० तिरुक्कुरळ 48
१०. मधुर भाषण
९१. धर्म के मर्मज्ञों के स्नेह-संयुक्त व प्रवंचना से रिक्त वचन ही मधुर
वचन होते हैं ।
९२. दयार्द्र होकर दान करने से भी कहीं श्रेष्ठ है प्रसन्न मुख के साथ
मधुर वचन व्यक्त करना ।
९३. मुख पर प्रेम-भाव लिये स्नेहपूर्ण दृष्टि के साथ हृदय से सीधे
निस्सृत मधुर वचन ही धर्म है ।
९४. सुखद मधुर वचन व्यक्त करनेवालों के पास दुखद दारिद्र्य कभी
नहीं फटकता ।
९५. नम्रता एवं मधुर वचन ही मनुष्य के आभूषण हैं । अन्य
वस्तुतः आभूषण नहीं हैं ।
९६. शुभ का ध्यान रखते हुए मधुर वचन कोई व्यक्त करे तो उसके
पाप-विमोचनार्थ धर्म की स्वतः अभिवृद्धि होती है ।
९७. दूसरों की सहायता करते हुए मानव-सुलभ माधुर्य से पूर्ण वचन
वक्ता को आनन्द एवं धर्म प्रदान करते हैं ।
९८. (दूसरों को दुख पहुँचाने की) तुच्छता से रिक्त मधुर बोल मृत्यु-
पर्यन्त एवं उसके अनन्तर भी आनन्द प्रदान करेंगे ।
९९. मधुर वचन के मधुर प्रभाव का इच्छुक क्योंकर कटु वचन का
प्रयोग करने लगा ?
१००. मधुर वचनों के होते हुए उन्हें छोड़ कटु वचन का प्रयोग करना
पके फल के बदले कच्चे को खाने के समान है ।