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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 334 में से

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पृष्ठ 64

अध्याय. ९ तिरुक्कुरळ 41
९. आतिथ्य
८१. घर व गृहस्थी का मूल उद्देश्य ही आतिथ्य व परोपकार है ।
८२. अमर जीवनप्रद अमृत ही क्यों न हो, अतिथि को बाहर छोड़ कर
स्वयं उसका उपभोग करना सर्वथा अनुचित ही है ।
८३. आनेवाले अतिथियों का अनुदिन यथोचित् सत्कार करनेवाले
के जीवन का पतन दारिद्र्य के कारण हो ही नहीं
सकता ।
८४. प्रसन्नवदन के साथ अच्छे अतिथियों का सत्कार करनेवाले के
गृह में लक्ष्मी का सानन्द निवास रहता है ।
८५. आतिथ्य के अनन्तर अवशेष पदार्थ का उपभोग करनेवाले की
भूमि के लिए बीजों की भी आवश्यकता है क्या ?
८६. आये हुए अतिथि का आदर-सत्कार करके, आनेवाले अतिथियों की
प्रतीक्षा में रहनेवाला स्वर्ग के सुरों का सुन्दर आतिथ्य प्राप्त करेगा ।
८७. कौन कह सकता है कि आतिथ्य रूपी यज्ञ का फल कितना
होता है ? वह तो अतिथि की योग्यता के समान रहता है ।
८८. अतिथि-यज्ञ सम्पन्न न करनेवाले विषमताओं में संग्रहीत सम्पत्ति
के नष्ट होने पर कहेंगे कि हम निराश्रित हो गये हैं।
८९. आतिथ्य का निर्वाह न करने की मूढ़ता ही धनी का
दारिद्र्य है । यह बुद्धिहीनों में ही होता है ।
९०. सूंघने पर मुरझा जाता है 'अनिच्चम' का पुष्प । मुँह टेढ़ा करके
देखने मात्र से अतिथि का आनन्द उड़ जाता है ।
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