तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ८. - तिरुक्कुरळ ३९
८. स्नेह-सम्पन्नता
७१. स्नेह में आवरण की अर्गला कहाँ हो सकती है ? स्नेही के
अश्रु-विन्दु मन की बात को प्रकट कर ही देते हैं।
७२. स्नेहशून्य सब वस्तुओं को अपने लिए मानते हैं। स्नेह-सम्पन्न
अपने शरीर को भी दूसरों का मानते हैं।
७३. अमूल्य आत्मा का शरीर के साथ सम्बन्ध केवल स्नेह-सम्पृक्त-जीवन
माना जाता है।
७४ स्नेह से पारस्परिक सहृदयता प्राप्त होती है जो मित्रता रूपी अमूल्य
महानता प्रदान करती है।
७५. संसार में सानन्द जीवन व्यतीत करनेवालों का गौरव स्नेह-सम्पन्न
जीवन में ही निहित है।
७६. अज्ञानी ही कहेंगे कि स्नेह धर्ममात्र का सहायक है, परन्तु
वास्तव में वीरता का भी वही सहायक होता है।
७७. जिस प्रकार अस्थिहीन जीव को आतप रसहीन कर देता है, उसी
प्रकार स्नेहहीन जीव को धर्म।
७८. स्नेहशून्य जीवन मरुस्थल में सूखे वृक्ष से कोपलें निकलने के
समान ही है।
७९. शरीर के अन्तःकरण में स्नेह न हो तो उस शरीर के सभी
बाह्यांगों से क्या लाभ सिद्ध हो सकता है ?
८०. स्नेह-पथ में चलनेवाला शरीर ही सजीव शरीर है, अन्यथा वह
हाड-चर्म वेष्टित सारहीन पदार्थ ही है।