तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
DevanagariHindipublished334 पृष्ठ
पृष्ठ 56, कुल 334 में से
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अध्याय ५. तिरुक्कुरळ ३३
२. गार्हस्थ्य-धर्म
५. गार्हस्थ्य-जीवन
४१. गृहस्थ अन्य तीनों आश्रमों में धर्मानुकूल जीवन व्यतीत
- करनेवालों का स्थाई सहायक होता है ।
४२. साधु, निर्धन तथा निराश्रित मृतकों का सहायक गृहस्थ है ।
४३. पूर्वज, भगवान, अतिथि, वन्धु तथा स्वयं—इन पाँचों के लिए
धर्मानुकूल सतत कर्म करना ही गृहस्थ का प्रधान कर्त्तव्य है ।
४४. धन संग्रह करते समय पाप से बचकर तथा व्यय करते समय
विभाजित करके (अर्थात् दूसरों को खिलाकर) जीवन व्यतीत करनेवाले
गृहस्थ का कभी पतन नहीं होता ।
४५. गार्हस्थ्य-जीवन स्नेह एवं धर्म से युक्त हो तो वही उसका सौन्दर्य
एवं फल होता है ।
४६. धर्मानुसार गार्हस्थ्य-जीवन व्यतीत करनेवाले व्यक्ति को अन्य
मार्गों का अनुसरण करने से क्या लाभ ?
४७. नियमानुसार गार्हस्थ्य-जीवन व्यतीत करनेवाला ही जीवन में प्रवृत्त
सभी आश्रमवासियों में श्रेष्ठ है ।
४८. दूसरों को धर्मपरायण बनानेवाला तथा स्वयं भी धर्म-च्युत हुए बिना
व्यतीत किया जानेवाला गार्हस्थ्य-जीवन तपस्वियों के जीवन से भी
कहीं महान होता है ।
४९. वस्तुतः गार्हस्थ्य-जीवन ही धर्म का पूर्ण रूप है और वह भी
दोषारोपण से दूर हो तो फिर कहना ही क्या ?
५०. संसार में यथायोग्य धर्मानुसार गार्हस्थ्य-जीवन व्यतीत करनेवाला
स्वर्ग के देवता के समान माना जायगा ।
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