तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १३३. तिरुक्कुरळ 298
१३३. प्रणय-कलह का आनन्द
१३२१. उनमें दोष न होने पर भी प्रणय-कलह उनका प्रेम अधिक
मात्रा में दिला सकता है ।
१३२२. प्रेम के किंचित मात्र मुरझाने पर भी प्रणय-कलह से उत्पन्न लघु
पीड़ा प्रशंसनीय ही होती है ।
१३२३. पृथ्वी और जल जैसा सामंजस्य प्राप्त पति-पली के लिए
प्रणय-कलह से बढ़कर स्वर्ग-लोक और कोई हो सकता है ?
१३२४. निरन्तन प्रेमालिंगन के साधक उस प्रणय-कलह में मेरे हृदय को
टूक-टूक करनेवाला शस्त्र उपस्थित प्रतीत होता है ।
१३२५. निर्दोष होने पर भी आलिंगन करनेवाली प्रेमिका के कोमल
स्कन्ध (प्रणय-कलह के फलस्वरूप) अलग रहने में कुछ
(अनुपम रस) होता है ।
१३२६. भोजन करने से अधिक उसका पचना आनन्ददायक होता है ।
प्रेम में भोग से अधिक प्रणय-कलह आदन्ददायक होता है ।
१३२७. प्रणय-कलह में पराजित ही विजयी होते हैं । यह पुनर्मिलन में
देखा जा सकता है ।
१३२८. लिलाट पर स्वेद-कण उत्पन्न करनेवाले सम्भोग से जनित लवण
(रस) क्या प्रणय-कलह के फलस्वरूप पुनः प्राप्त न होगा ?
१३२९. प्रकाशपूर्ण भूषणों से युक्त मेरी प्रणयिनी प्रणय-कलह करती
रहे । रात लम्बी होतीं रहे कि मैं प्रेम-याचना करता रहूँ ।
१३३०. प्रेम का आनन्द प्रणय-कलह में है, और प्रणय-कलह का
आनन्द पुनः मिलकर प्रेमालिंगन होने में है ।