तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १०९ तिरुक्कुरळ 291
१३२. प्रणय-कलह की सूक्ष्मता
१३११. हे दुराचारी ! सभी स्त्रियां तुम्हें सामान्य मानकर नेत्रों से
तुम्हारा रस-पान कर रहीं हैं। मैं तुम्हारी छाती से न लगूँगी।
१३१२. प्रणय-कलह में थी कि वे छींक* बैठे, मानो इस विचार से कि
मैं उनके दीर्घ-जीवन के लिए आशिष दूँगी।
१३१३. सुमन-माला पहनूँ भी तो रुष्ट हो कहती हैं कि किसी और को
दिखाने के लिए आपने इन्हें पहना है।
१३१४. मैंने कहा—"मुझे और किसी से प्रेम नहीं है" तो वह रुष्ट
होकर पूछने लगी "और किस से, और किस से?"
१३१५. मैंने कहा—"इस जन्म में कभी अलग न होंगे", तो उसके
नेत्र सजल हो उठे (कि कदाचित् आगामी जन्म में
कहीं अलग न हो जायें)।
१३१६. मैंने कहा, "तुम्हारा ही सरण किया"। वह रूठकर "तो
मुझे आप पहले क्यों भूले रहे" कहकर आलिंगन किये बिना
प्रणय-कलह करती हुई अलग बैठ गयी।
१३१७. ज़रा मुझे छींक आ गयी। "बधाई!" कहकर वह रोती हुई
पूछने लगी कि किसके सरण करने के कारण यह छींक आयी?"
१३१८. आती हुई छींक को मैंने दबा लिया। वह रोती हुई कहने
लगी—"अपनी किसी प्रिया के सरण को मुझ से छिपाते हैं?"
१३१९. (रूठी हुई प्रेमिका को) प्रेम से समझा कर प्रसन्न करने पर भी
वह और रूठकर कहने लगी—"दूसरों को आप इसी प्रकार
प्रसन्न करते होंगे!"
१३२०. उसके प्रेम-व्यवहारों के सरण के साथ सप्रेम उसे निहारूँ तो भी
वह रुष्ट हो पूछती है कि और किससे (मेरे सर्वांगों की)
तुलना करने के विचार से सब को ध्यान से देख रहे हैं?"
- छींक आने पर माना जाता है कि किसी ने छींकनेवाले व्यक्ति का
स्मरण किया है।