तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १३१ तिरुक्कुरळ 289
१३१. प्रणय-कलह
१३०१. प्रणय-कलह की पीड़ा (के लक्षण) उनमें ज़रा देखने के लिए
आलिंगन किये बिना रहो।
१३०२. भोजन में नमक की मात्रा के समान होता है प्रणय-कलह;
वह अधिक होने लगे तो बढ़ने न दो।
१३०३. अपनी उस कुपिता का तुम आलिंगन न करोगे तो दुखिया को
और अधिक दुःख पहुँचाने के समान ही होगा।
१३०४. जो प्रणय-कलह किये बैठी है उसके भाव को न समझना
मुरझायी हुई लता का मूलोच्छेद करने के समान है।
१३०५. सद्गुणी-सज्जन की शोभा सुमन-नयनी के मन में उत्पन्न
होनेवाले प्रणय-कलह में ही है।
१३०६. छोटे-बड़े प्रणय-कलह न हों तो प्रेम अधिक पके व अधकच्चे
फल के समान रह जायगा।
१३०७. प्रणय-कलह में एक दुखद आशंका यह रहती है कि मिलन-
सुख कहीं अस्थाई न रह जाय।
१३०८. वेदना को समझनेवाले प्रियतम की अनुपस्थिति में मेरे दुखित
होने से क्या लाभ?
१३०९. जल भी छाया का ही मधुर होता है। प्रणय-कलह भी
प्रियतम के साथ ही मधुर होता है।
१३१०. मेरे प्रणय-कलह को मुरझा जाने के लिए छोड़ बैठनेवाले के
साथ मेरा हृदय मिलन का प्रयत्न करता है तो यह उसकी
तीव्र इच्छा ही है।
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