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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

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पृष्ठ 312

अध्याय १३० तिरक्कुरळ 287
१३०. हृदय पर क्रोध
१२९१. हे हृदय ! प्रियतम के हृदय को उनका साथ देता हुआ
देखकर भी तू मेरा साथ क्यों नहीं देता ?
१२९२. हे हृदय ! तुझ से प्रेम न करनेवाले प्रियतम को देखते ही,
यह समझकर भी कि वे बिना मिले न रहेंगे, तू उनसे
मिल ही जाता है ।
१२९३. हे हृदय ! क्या तू इच्छानुसार यह समझकर उनके पीछे
चल पड़ता है कि भाग्यहीन का कोई सुहृद नहीं होता ?
१२९४. हे हृदय ! तू प्रणय-कलह के प्रतिफल को समझ नहीं पाता ।
फिर तेरे साथ ऐसा कौन करेगा ?
१२९५. प्रियतम के दूर रहने पर अप्राप्ति का भय और साथ
रहने पर वियोग का भय ही मुझे लगा रहता है । इस
प्रकार मेरा हृदय सदा दुविधा में पड़ा रहता है ।
१२९६ एकांत में मैं उनका स्मरण करूँ तो मेरा हृदय मुझे खा ही
डालना चाहता है ।
१२९७. उन्हें न भूलनेवाले गौरवच्युत एवं पागल हृदय के साथ
मिलकर मैं अपनी (स्त्रियोचित) लज्जा भी खो बैठी ।
१२९८. उनकी निन्दा में अपना ही अपयश मानकर मेरा ' प्राण - प्रिय
ह्रयद उनके श्रेष्ठ गुणों का ही स्मरण करता है ।
१२९९. विपत्ति के समय अपना ही हृदय अगर साथ न देता हो तो
और कौन साथ देगा ?
१३००. अपना ही हृदय साथ नहीं देता तो दूसरों का हमारा साथ न
देना स्वाभाविक ही है ।