तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १२९. तिरुक्कुरळ 285
१२९. सम्भोगाभिलाषा
१२८१. स्मरण मात्र से सुख तथा दर्शन मात्र से आनन्द प्राप्त होता है
प्रेम में, न कि मदिरा में।
१२८२. ताड़ के समान प्रेम उभरकर आता हो तो तिनका भर भी
कलह न करना चाहिए।
१२८३. मेरा विचार न करके अपनी मनमानी करने पर भी प्रियतम को
देखे बिना मेरे ये नेत्र अशाँत रहते हैं।
१२८४. हे सखी! मैं कलह करने के विचार से गयी, परन्तु
उसे भूलकर मेरा हृदय उनसे मिलन करने पहुँच गया।
१२८५. लिखते समय नेत्र लेखनी को जैसे नहीं देखते वैसे ही
प्रियतम को देखते ही उनके दोष मैं नहीं देखती।
१२८६. उनको देखते समय उनके दोष नहीं दिखते, और उनको
न देखते समय उनके निर्दोष-व्यवहार नहीं दिखते।
१२८७. बाढ़ के भयंकर प्रवाह को समझकर भी उसमें कूदनेवाले के
समान, समझकर भी झूठमूठ उनसे कलह करने में प्रयोजन
ही क्या है?
१२८८. हे वंचक! अपयशप्रद् विपत्तियों को उत्पन्न करने पर भी
पियक्कड़ों के लिए मदिरा के समान है तुम्हारी छतियाँ।
१२८९. पुष्प से भी मृदुल होता है प्रेम। विरले ही उसकी
वास्तविकता को समझकर उससे लाभान्वित होते हैं।
१२९०. नेत्रों में तो थी कलह भावना, परन्तु (मेरे वहाँ पहुँचते ही)
अस्थिर हो मुझ से अधिक वही गाढ़ालिंगन करने लगी।