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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

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पृष्ठ 308

अध्याय १२८ तिरुक्कुरळ 283
१२८. संकेताभिव्यक्ति
१२७१. छिपाने पर भी निर्बन्ध हो सीमोलंघन करके तुम्हारे अपने नेत्र
अभिव्यक्त करनेवाला विषय एक है।
१२७२. विशाल नेत्र एवं बाँस जैसी स्कन्धोंवाली इस बेचारी में
स्त्रियोचित सरल स्वभाव अत्यधिक है।
१२७३. मणि-माला में उपस्थित सूत्र के समान प्रियतमा के
सौन्दर्य में सन्निहित एक संकेत उपस्थित है।
१२७४. सुमन-मुकुल में उपस्थित सुगन्धि के समान इस सरला के
स्मित हास्य में एक संकेत-विशेष उपस्थित है।
१२७५. घनी चूड़ियों से युक्त मेरी प्रेयसी के कुछ करके छिप
जाने में उपस्थित संकेत मेरी हृदय-वेदना को मिटाने की
औषधि से युक्त है।
१२७६. अत्यधिक प्रेम सहित उनका मिलन उनके निष्प्रेम व्यवहार का
स्मरण कराता है।
१२७७. शीतल स्वभाव से युक्त प्रियतम के वियोग को हम से पूर्व
हमारी चूड़ियाँ ताड़ गयीं।
१२७८. कल ही छोड़ कर गये हमारे प्रियतम, पर मैं अपने शरीर पर
सात दिनों का पीलापन व्याप्त पाती हूँ।
१२७९. प्रेयसी ने चूड़ियों को देख कर कोमल स्कन्धों को देखा,
और फिर चरणों को—ये थे उस समय के उसके संकेत।
१२८०. नेत्रों से प्रेम-रोग को अभिव्यक्त करके (पृथक न होने की)
याचना करने में स्त्री का स्त्रीत्व-विशेष माना जाता है।