तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १२७ तिरुक्कुरळ 281
१२७. संयोग की उत्कट अभिलाषा
१२६१. प्रियतम की बाट जोहते-जोहते नेत्रों की शक्ति जाती
रही और उनके जाने से दिनों को अंकित करते-करते
उँगलियाँ घिस गयीं ।
१२६२. विरह-वेदना से व्यथित मैं आज उन्हें भूल जाऊँ तो शरीर
सौन्दर्यहीन हो, स्कन्धों पर पहने हुए आभूषण भी
गिर जायेंगे ।
१२६३. विजय-वांछा एवं उत्साह की सहायता से गये हुए प्रियतम के
आगमन के दर्शनार्थ ही अब भी जीवित हूँ ।
१२६४. संयोग-सुख को त्याग कर गये हुए प्रियतम के प्रत्यागमन के
स्मरण मात्र से मेरा हृदय वृक्ष की शाखा पर चढ़कर देखने
लगता है । (अर्थात् फूलने लगता है ।)
१२६५. आँखें भरकर प्रियतम को देखूँ ! देखने पर मेरे कोमल
स्कन्धों का पीलापन स्वतः दूर हो जायगा ।
१२६६. मेरे प्रियतम एक दिन लौटकर आ जायँ तो मैं उन्हें
(आँखें भरकर) ऐसा देखूँ कि सम्पूर्ण प्रेम-रोग उड़ जाय ।
१२६७. नयन जैसे मेरे प्रियतम आ जायँ तो मैं कलह करूँगी या
आलिंगन या दोनों ?
१२६८. सम्राट् इस युद्ध में कर्म-रत हो विजयी होवें और मैं घर जाकर
सायंकाल के समय (प्रेमिका का) आतिथ्य स्वीकार करूँ ।
१२६९. प्रोषित-पतिका के लिए एक दिन सात दिनों के समान
होता है ।
१२७०. (विरहाधिक्य के फलस्वरूप) हृदय के विदीर्ण होने के