तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १२६ तिरुक्कुरळ 279
१२६. मान-भंग
१२५१. मान नामक लज्जा की चटकनी से युक्त किवाड़ों को प्रेम की
कुल्हाड़ी फोड़ देती है।
१२५२. प्रेम निर्दय होता है। वह मध्य निशा में भी मेरे हृदय पर
अधिकार जताता है !
१२५३. मैं प्रेम को अपने में ही छिपाने का प्रयत्न तो करती हूँ,
परन्तु वह छींक के समान बिना किसी सूचना के व्यक्त
हो ही जाता है।
१२५४. मैं तो अपने को सम्मान युक्त समझे बैठी थी, परन्तु मेरा
प्रेम सीमा को लाँघ कर प्रकाश्य रूप से व्यक्त हो ही जाता है।
१२५५. छोड़ कर गये हुए प्रियतम के पीछे न जाने के गौरवपूर्ण
व्यवहार को प्रेम-रोग से पीड़ित व्यक्ति नहीं जानते।
१२५६. मुझे व्याप्त की हुई इस पीड़ा का स्वभाव ही कैसा है कि
छोड़ कर गये हुए (उस निष्ठुर प्रियतम) के ही पीछे
भागता है !
१२५७. प्रियतम सप्रेम मेरे इच्छित कर्म करें तो लज्जा नामक उस एक
गुण को ही भूल जाऊँ।
१२५८. अनेक मायाओं से युक्त उस (प्रियतम) चोर के दीन वचन
हमारे स्त्रीत्व को भंग करनेवाली सेना ही तो है ?
१२५९. मैं तो कलह करने के विचार से गयी, परन्तु हृदय उनसे
मिल जाने के कारण आलिंगन कर बैठी।
१२६०. अग्नि में पिघलनेवाले मोम सदृश हृदयवाली स्त्री में संयोग होने पर
भी कहीं कलह करने का स्वभाव ठहर सकता है ?