तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १२५ तिरुक्कुरळ 277
१२५. स्वगत-संलाप
१२४१. हे हृदय ! ध्यान से विचार कर इस प्रेम की बीमारी को
मिटाने का कोई औषध नहीं बताओगे ?
१२४२. हे हृदय ! तू धन्य है ! उनमें प्रेम न होते हुए भी तेरा
दुखित होना केवल अज्ञान है ।
१२४३. हे हृदय ! मुझ में उपस्थित रहकर उनका स्मरण करके
व्यथित क्यों होते हो? इस व्यथा के उत्पादक के मन में
तेरे लिए सस्नेह स्मरण तक नहीं है ।
१२४४. हे हृदय ! नेत्रों को भी साथ ले चलो । उनके दर्शनार्थ ये
मेरी जान खा रहे हैं ।
१२४५. हे हृदय ! हमारे प्रेम करने पर भी वे निर्मम (प्रियतम)
चले गये हों तो क्या हम भी उन्हें छोड़ सकती हैं ?
१२४६. हे हृदय ! तू वस्तुतः मिथ्या क्रोध से सूख रहा है; (क्योंकि)
संयोग होते ही सन्तुष्ट करनेवाले प्रियतम के दर्शन मात्र से
तू सारा विरोध भूल बैठता है ।
१२४७. हे मेरे अच्छे हृदय ! या तो प्रेम को त्याग, नहीं तो
लज्जा को । मैं इन दोनों को (एक सार्थ) नहीं सह सकती ।
१२४८. हे मेरे भोले हृदय ! बिछुड़े हुए प्रियतम प्राप्त न होने के कारण
सिसक-सिसक कर उन्हीं के पीछे चलते हो ?
१२४९. हे मेरे हृदय ! मुझ में ही उपस्थित हैं मेरे प्रियतम; उनका
स्मरण करके किनके पास उन्हें खोजने जा रहे हो ?
१२५०. साथ न रहकर पूर्णतः त्याग करनेवाले को हृदय में बनाये
रखने पर भी हम सौन्दर्य खो बैठती हैं ।