तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
पृष्ठ 300, कुल 334 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १२४ तिरक्कुरळ -275
१२४. अंग-सौन्दर्य की क्षति
१२३१. मुझे विरह-वेदना देकर विदेश गये हुए प्रियतम के स्मरण से
(मेरे क्षीण हो जाने के कारण) नेत्र सुन्दर सुमनों के सम्मुख
लज्जित हुए ।
१२३२. पीली रोती हुई आँखें प्रियतम का प्रेम प्राप्त न होने की मानो
घोषणा कर रहे हैं ।
१२३३. संयोग के दिन फूले हुए स्कन्ध आज (ढीले पड़कर) वियोग को
मानो स्पष्टतः व्यक्त कर रहे हैं ।
१२३४. प्रियतम के वियोग के कारण स्कन्ध के सौन्दर्य-च्युत हो
सिकुड़कर क्षीण पड़ने से चूड़ियाँ भी फिसलती जा रही हैं ।
१२३५. भूतकालीन सहज सौन्दर्य से च्युत, चूड़ियों को फिसलानेवाले
सिकुड़े हुए स्कन्ध निष्ठुर प्रियतम की निर्ममता को
व्यक्त कर रहे हैं ।
१२३६. फिसलती चूड़ियों तथा सिकुड़े स्कन्धों को देख प्रियतम को
‘निष्ठुर’ कहते सुनकर मैं दुखित हूँ ।
१२३७. हे हृदय ! उस निष्ठुर प्रियतम से मेरे सिकुड़े हुए स्कन्धों की
विवशता को व्यक्त करके क्या गौरवान्वित होना चाहते हो ?
१२३८. आलिंगित करों को तनिक ढीला किया कि सुन्दर चूड़ियों से
भूषित उस बेचारी का माथा पीला पड़ गया ।
१२३९. गाढ़ालिंगन के मध्य तनिक शीतल वायु के प्रवेश के कारण
बेचारी के विशाल शीतल नेत्र तुरन्त पीले पड़ गये ।
१२४०. प्रेमिका का प्रकाशपूर्ण माथा पीला पड़ते देख उस (प्रियतम) के
नेत्र भी पोले हो पीड़ित हुए ।