सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 334 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 298

अध्याय १२३ तिरुक्कुरळ 273
१२३. सान्ध्य-वेदना
१२२१. सन्ध्या ? नहीं प्रेमियों की प्राण-भक्षिणी अन्तिम अवधि है !
सन्ध्ये ! तू धन्य है ।
१२२२ हे मन्द-प्रभा सन्ध्ये ! धन्य है ! क्या तू भी मेरे समान
दुखी है ? तेरा सहयोगी भी क्या मेरे प्रियपम के समान
निर्दय है ?
१२२३. ओस-कण युक्त मन्द-प्रभा सन्ध्या अब मुझे अधिकाधिक पीड़ा
देती हुई बढ़ती ही चली आ रही है ?
१२२४. प्रियतम की अनुपस्थिति में सन्ध्या ऐसी आती है जैसे शूली
चढ़ाने के स्थल पर जल्लाद ।
१२२५. प्रातःकाल का मैने उपकार ही क्या किया था, और दुःखदायिनी
इस सन्ध्या का क्या अपकार ?
१२२६. प्रियतम के साथ संयोग में रहते समय मै सन्ध्या के इस दुःखप्रद
व्यवहार से अज्ञात थी ।
१२२७. (प्रेम की) यह बीमारी प्रातःकाल कली-सी रहकर सम्पूर्ण दिवस
क्रमशः बढ़कर सन्ध्या में पूर्णतः विकसित हो उठती है ।
१२२८. अग्नि सदृश दुःखदायिनी सन्ध्या की दूती बनकर ग्वाले की
मुरली मेरे लिए संहारक शस्त्र के समान है ।
१२२९. बुद्धि को विकार-ग्रस्त करती हुई ढलनेवाली सन्ध्या के
साथ-साथ यह नगर भी विकार-ग्रस्त हो दुखी होगा ।
१२३०. धनोपार्जन के हेतु गये हुए प्रियतम का स्मरण कर (विरह में भी)
बचे हुए मेरे प्राण इस विकार-ग्रस्ता सन्ध्या में कूँच
कर रहे हैं ।
35