तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १२२ तिरुक्कुरळ 271
१२२. स्वप्नावस्था का वर्णन
१२११. प्रियतम का सन्देश लानेवाले उस स्वप्न का आतिथ्य
मैं किस प्रकार करूँ ?
१२१२. मेरी इच्छा के अनुसार नेत्र निद्रामग्न हो जायँ तो
स्वप्न में आ मिलनेवाले (प्रियतम) से अपने बचे रहने के मर्म को
व्यक्त करूँ।
१२१३. जाग्रतावस्था में अप्राप्त प्रियतम को कम से कम स्वप्नावस्था में
देख पाने के कारण ही मेरे प्राण टिके हुए हैं।
१२१४. स्वप्न के प्रेम-व्यवहार जाग्रतावस्था में प्रेम न करनेवाले
प्रियतम को खोज लाने के लिए ही हैं।
१२१५. जाग्रतावस्था का आनन्द संयोग के समय ही रहा।
स्वप्न भी देखने भर तक मधुर होता है।
१२१६. 'जाग्रत' नामक अवस्था न रहे तो स्वप्न में प्रियतम मुझसे
कभी पृथक न हों।
१२१७. जाग्रतावस्था में प्रेम न करनेवाले निष्ठुर प्रियतम स्वप्न में आकर
क्यों मुझे तंग करते हैं ?
१२१८. निद्रा के समय स्वप्न में स्कन्धों पर स्थित रहकर जागते
ही शीघ्र हृदय में प्रविष्ट हो जाते हैं।
१२१९. स्वप्न में प्रियतम के दर्शन न करनेवाली ही जाग्रत में प्रेम
न करनेवाले प्रियतम को भला-बुरा कहेंगी।
१२२०. 'जाग्रत में (प्रियतम) मुझे छोड़ गये' ऐसा
कहनेवाली, क्या स्वप्न में उनके दर्शन नहीं करतीं ?