तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ११७ तिरुक्कुरळ 261
११७. विरहिणी का विलाप
११६१. मैं इस ज्वर को छिपा तो लूँ; परन्तु स्रोत का जल
निकाले जाने पर भी पुनः भर जाने के समान यह
बढ़ जाता है ।
११६२. इस काम-वेदना को छिपाया भी नहीं जाता और इसे
पहुँचानेवाले प्रेमी से कहने में भी लज्जा आती है ।
११६३. असह्य वेदना-ग्रस्त मेरे शरीर में प्राण रूपी डण्डे के दोनों
छोरों पर काम और लज्जा लटके हुए हैं ।
११६४. काम-वेदना का समुद्र उपस्थित है, परन्तु उसे पार करने के
लिए आवश्यक साधन रूपी नाव नहीं है ।
११६५. प्रेम में ही दुःख देनेवाले, शत्रु बनने पर न जाने
क्या-क्या कर बैठेंगे !
११६६. काम (संयोग के समय) आनन्द का समुद्र होता है, परन्तु
(वियोग में) उसका दुःख समुद्र से भी विशाल होता है ।
११६७. मैं काम के घोर प्रवाह के किनारे को तैरकर भी पा न सकी;
अर्ध रात्रि में भी अकेली ही हूँ ।
११६८. सम्पूर्ण जीव-राशि को अपनी गोद में सुलानेवाली इस
बेचारी रात्रि के लिए यहाँ मेरे अतिरिक्त और कोई
सहायक नहीं है ।
११६९. निष्ठुर प्रियतम की निर्ममता से भी अधिक कठोर हैं इन
दिनों की रातें जो लम्बी होकर बीत रही हैं ।
११७०. मैं भी अपने हृदय के समान प्रियतम के पास जा पाती तो
आँखों को अश्रु-प्रवाह में तैरने की आवश्यकता न होती ।