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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 334 में से

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पृष्ठ 284

अध्याय ११६ तिरुक्कुरळ 259
२. पातिव्रत्य
११६. असह्य वियोग
११५१. (हे प्रियतम !) जाना न हो तो मुझसे कहें, अन्यथा अपने द्रुत
प्रत्यागमन का समाचार उनसे कहें जो तब तक जीवित रहेंगे।
११५२. पहले तो उनकी दृष्टि आनन्ददायक थी, पर अब उनका मिलन
वियोग-भय-जनित दुःख से पूर्ण है।
११५३. समय-समय पर पृथक होना अवश्यम्भावी होने के कारण मेरी
विरह-वेदना से परिचित प्रियतम से भी कभी पृथक न होने का
दृढ़ वचन सुनकर विश्वास नहीं किया जाता।
११५४. (वियोग से ) निडर रहने का दृढ़ आश्वासन देनेवाले ही छोड़कर
चले जायँ तो उनके दृढ़ वचनों पर विश्वास करनेवाली का
क्या दोष ?
११५५. मुझे बचाना ही है तो शीघ्र उनके वियोग से बचाओ, अन्यथा
वियोग के पश्चात् पुनर्मिलन असम्भव है।
११५६. वे वियोग की चर्चा उठानेवाले पत्थर-दिल हों तो लौटकर प्रेम
करने की इच्छा भी व्यर्थ है।
११५७. पूर्वतः हाथ की कलाई से न उतरनेवाली मेरी चूड़ियाँ
प्रियतम से मेरे वियोग को कैसे न घोषित करेंगी ?
११५८. प्रिय बन्धुओं से रहित नगर का निवास दुखद होता है,
पर उससे भी अधिक दुखद होता है प्रियतम का वियोग।
११५९. स्पर्श करने पर ही जलानेवाली अग्नि क्या काम-ज्वर के
सदृश वियोग होने पर भी जला सकती है ?
११६०. असह्य विरह के ज्वर को भी सहते हुए वियोग के पश्चात्
जीवन व्यतीत करनेवाले अनेक हैं।