तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ११० 'तिरुक्कुरळ '247
११०. संकेत-परिचय
१०९१. इसके अंजन-रंजित नयनों में दो प्रकार की दृष्टि है । एक
: ज्वर उत्पन्न करनेवाली है और दूसरी उस ज्वर की औषधि ।
१०९२. गुप्त नेत्रों की उस संकोच युक्त दृष्टि में (निहित आनन्द) काम
भोग का अर्ध भाग नहीं, अपितु उससे कहीं अधिक है ।
१०९३. देखा ; देखकर (मेरे देखते ही) सिर झुका लिया ।
यह है अपनी प्रेम-लता के लिए उसके द्वारा सिंचित नीर ।
१०९४. जब मैं उसकी ओर देखूँ तो वह पृथ्वी की ओर दृष्टि
डालती है, अन्यथा वह मेरी ओर देखकर मन्द-मन्द
मुस्कराती है ।
१०९५. मुझे सीधे तो देखती नहीं है, परन्तु एक नेत्र सिकोड़ती हुई-सी
मुस्कराती है ।
१०९६. 'अपरिचित जैसे बोलने पर भी, स्नेह-सम्पृक्त वचन का बोध शीघ्र
हो ही जायगा ।
१०९७. उसके मधुर व कठोर वचन तथा शत्रुओं की-सी दृष्टि वाह्यतः
अपरिचित से लगने पर भी वस्तुतः सस्नेह होने के संकेत हैं ।
१०९८. मै देखता हूँ तो वह स्नेहिनी स्मित-हास करती है । तब उस
कोमलांगी में एक अनुपम सौन्दर्य छा जाता है ।
१०९९. अपरिचित जैसे सामान्य दृष्टि से देखना मानो कामुक नेत्रों का
ही गुण है ।
११००. नयनों से नयन मिलकर एक हो गये तो मुख के बोलों से
कोई प्रयोजन नहीं ।