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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 266, कुल 334 में से

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पृष्ठ 266

अध्याय १०८ तिरुक्कुरळ 241
१०८. नीचता
१०७१. मनुष्य जैसे ही होते हैं नीच; ऐसी समानता हमने और कहीं
नहीं देखी है।
१०७२. शुभ का ज्ञान रखनेवालों से अधिक धनी नीच ही होते हैं,
क्योंकि इन्हें हृदय में किसी बात की चिन्ता नहीं रहती।
१०७३. नीच देवता के समान होते हैं, क्योंकि वे भी अपनी इच्छा के
अनुसार ही कार्य करते हैं।
१०७४. नीच अपने से पतित व्यक्ति देखता है तो अपने को उससे
श्रेष्ठ मानकर गर्व का अनुभव करता है।
१०७५. भय में ही नीचों का सदाचार निहित है, इसके अतिरिक्त
इच्छा-पूर्ति के हेतु भी थोड़ा रहता है।
१०७६. पिटनेवाले ढोल के समान होते हैं नीच, क्योंकि स्वयं सुनी हुई
गुप बात को दूसरों से कह बैठते हैं।
१०७७. दाँतों को तोड़नेवाली मुट्ठी जिनकी नहीं होती, उन्हें
हाथ का जूठन भी नीत नहीं देंगे।
१०७८. कथन मात्र से लाभप्रद सिद्ध होंगे बुद्धिमान, और गन्ने के समान
निचोड़े जाने पर ही लाभप्रद सिद्ध होता है नीच।
१०७९. नीच किसी का वस्त्र-धारण और भोजन करना देखे तो
उसका उद्देश्य दोपान्वेषण ही होता है।
१०८०. किसी विपत्ति के समय शीघ्र बिकने के अतिरिक्त नीच और
किस काम के योग्य होते हैं?
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