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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 334 में से

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पृष्ठ 256

अध्याय १०३ तिरुक्कुरळ 231
१०३. वंश चलाने की रीति
१०२१. 'कर्त्तव्य पालन से कभी पीछे न हटूंगा' में निहित गौरव से
श्रेष्ठ और कोई नहीं है।
१०२२. उग्र परिश्रम एवं विशाल बुद्धि--इन दोनों से युक्त अटूट
कर्म से वंश की वृद्धि होगी।
१०२३. 'अपगे वंश को विकसित करूँगा,'—ऐसा कहनेवाले
के हितार्थ देवता स्वयं धोती कसकर आगे आ डटेंगे!
१०२४. अपने वंश को पतनोन्मुख हुए बिना उन्नतिशील बनानेवाले के
कर्म उसके जाने बिना पूर्ण हो जायेंगे।
१०२५. निर्दोष गृहस्थ को सारा संसार अपना बन्धु मानकर
घेरे रहेगा।
१०२६. जन्मे हुए कुटुम्ब के गौरव को अपना बना लेना ही
किसी के लिए वास्तविक गौरव है।
१०२७. समर क्षेत्र के वीर योद्धा के समान अपने कुटुम्ब के गौरव को
बनाये रखनेवाले पर ही उसका उत्तरदायित्व रहता है।
१०२८. सद्-गृहस्थ के लिए काल-विशेष कोई नहीं होता। सुस्त हो
मान-हानि का विचार करनेवाले के वंश का गौरव
नष्ट हो जायगा।
१०२९ अपने कुटुम्ब पर आनेवाले दोष को रोकनेवाले का शरीर, क्या
दुःख का ही निवास स्थान है?
१०३०. विपत्तियों को सहनेवाला सज्जन जिस वंश में नहीं होता,
वह विषम परिस्थिति के समय (विपत्तियों की कुल्हाड़ी से)
कटकर गिर पड़ेगा।