तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १०२ तिरुक्कुरळ 229
१०२. लज्जाशीलता
१०११. अनुचित कर्म के कारण लज्जित होना ही लज्जा है ।
सुमुखियों की स्वाभाविक लज्जा कुछ और है ।
१०१२. भोजन, वस्त्र तथा शेष विषय मानवमात्र के लिए एक-से हैं ।
लज्जाशील होना श्रेष्ठ मानव की विशेषता है ।
१०१३. सभी जीव सशरीर होते हैं । लज्जा नामक गुण-गरिमा में
ही गौरव निहित है ।
१०१४. लज्जाशीलता मानव का अलंकार है ! बुद्धिमान में यह
न हो तो मान सहित चलना भी एक व्याधि है ।
१०१५. संसार कहेगा कि दूसरों की और अपनी निन्दा से लज्जित
होनेवाला लज्जा के टिकने का एक स्थल है ।
१०१६. श्रेष्ठ व्यक्ति लज्जा की मेड़ लगाये बिना विशाल संसार के
जीवन की इच्छा नहीं करते ।
१०१७. लज्जाशील व्यक्ति लज्जा से अपने प्राण का स्याग तो
कर देंगे, पर प्राण के हेतु लज्जा का त्याग न करेंगे ।
१०१८. दूसरे जिससे लज्जित होते हों उससे जो लज्जित नहीं होता,
धर्म लज्जित हो उसका त्याग कर बैठेगा ।
१०१९. सिद्धान्त से च्युत होना कुल को कलंकित करता है ।
निर्लज्जता स्थाई , हो जाय तो सभी अच्छाइयों का सर्वनाश कर
देती है ।
१०२०. निर्लज्ज हृदयवाले व्यक्ति की उपस्थिति कटपुतली को रस्सी से
खींचकर सप्राण होने के भ्रम में डालने के समान है ।