तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ९७ तिरुक्कुरळ 219
९७. सम्मान
९६१. श्रेष्ठता के लिए, अनिवार्य होने पर भी, अपने व्यक्तित्व को
गिरानेवाले कर्मों को सर्वथा त्याग दो ।
९६२. सुयश एवं सम्मान के इच्छुक सुयश प्राप्त होने पर भी अगौरवपूर्ण
कर्म कभी न करेंगे ।
९६३. धन अधिक होने पर नम्रता धारण करो, और ज़रा कम
पड़ने पर अपना सिर ऊँचा बनाये रखो ।
९६४. सम्मान-युक्त स्थिति से च्युत व्यक्ति की दशा सिर से गिरे हुए
बालों जैसी होती है ।
९६५. पर्वत जैसे श्रेष्ठ व्यक्ति भी अपने तिल जैसे क्षुद्र कर्म के कारण
निम्न गिने जाते हैं ।
९६६. निन्दकों के पीछे चलने से क्या प्रयोजन, जब उससे न यश
प्राप्त हो सकता है और न स्वर्ग ही सधता है ?
९६७. निन्दकों के पीछे चलकर जीवन बनाये रखने से अच्छा है
वैसा न करके जीवन को ही समाप्त कर देना ।
९६८. विशिष्ट आत्म-सम्मान का ही नाश होते समय इस शरीर मात्र का
जीवित रहना, क्या मृत्यु से बचने की कोई औषधि है ?
९६९. सम्मान के च्युत होते ही प्राण त्यागनेवाले, बालों के गिरने पर
प्राण छोड़नेवाले 'कवरिमान' (एक प्रकार का मृग) के समान
होते हैं ।
९७०. अपयश आ पड़ने पर प्राणार्पण करनेवाले मान-युक्त व्यक्ति
के यश की लोग पूजा करके प्रशंसा करेंगे ।