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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 334 में से

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पृष्ठ 228

अध्याय ८९ तिरुक्कुरळ 203
८९. अन्तःवैर
८८१. छाया और जल भी हानिप्रद हो तो बुरे ही होते हैं। उसी
प्रकार बन्धुओं के व्यवहार भी दुखद हों तो वे भी
बुरे ही होंगे।
८८२. खड्ग जैसे (व्यक्त) शत्र से न डरो, पर बन्धु जैसा होकर भी
जो शत्रु हो उसके सम्पर्क से अवश्य डरो।
८८३. अन्तःवैर से सतर्क रहकर अपनी रक्षा करो, (अन्यथा) जरा
सुस्त पड़ते समय मिट्टी के पात्र को काटनेवाले अस्त्र के समान
(यह तुम्हारा) निस्सन्देह नाश करेगा।
८८४. अपरिवर्त्तनशील अन्तःवैर किसी में उत्पन्न हो जाय तो वह
बन्धुओं का विनाश करनेवाले अनेकानेक दोषों का
सृजन करेगा।
८८५. बन्धुत्व के साथ अन्तःवैर उत्पन्न हो गया तो वह मृत्युजनक
अनेकानेक दोषों का सृजन करेगा।
८८६. शत्रुता किसी के अधीनस्थ व्यक्तियों में उत्पन्न हो जाय तो उसका
स्थायित्व सदा के लिए असम्भव हो जाता है।
८८७. डब्बे और ढक्कन के मेल के समान संयुक्त रहने पर भी
अन्तःवैर जिस कुटुम्ब में हो वह कभी एक होकर
नहीं रह सकता।
८८८ अन्तःवैर जिस कुटुम्ब में हो वह रेती से घिसते जानेवाले लोहे
के समान छीजता चला जायगा।
८८९. तिल के एक टुकड़े के समान छोटा होने पर भी अन्तःवैर
नाशकारक होता है।
८९०. समरसता से रहित जीवन एक कुटी में सर्प के साथ रहने के
समान होता है।