तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ८८ तिरुक्कुरळ 201
८८. शत्रु बल का बोध
८७१. शत्रुता नामक असभ्य व्यवहार की इच्छा कोई हास्य में भी
न करे।
८७२. धनुष रूपी हल से युक्त कृषक से भले ही शत्रुता कर ले,
पर शब्द रूपी हल से युक्त कृषक (ज्ञानी व बुद्धिमान) से
कभी शत्रुता न करे।
८७३. स्वयं अकेले ही अनेक व्यक्तियों की शत्रुता को मोल लेनेवाला
विक्षिप्तों से भी मन्दबुद्धिवाला होता है।
८७४. शत्रुता को भी मित्रता में लाकर व्यवहार करनेवाले सभ्य
व्यक्तियों की महानता पर संसार आधारित है।
८७५. जब अपना सहायक कोई न हो, शत्रु दो हों और स्वयं
अकेले पड़ जाओ तो उन दो में से एक को अपना सहायक
बना लो।
८७६. किसी शत्रु का पूर्ववत् बोध हो या न हो, पर विनाश के समय
उससे न शत्रुता रक्खो और न मित्रता ही।
८७७. तुम्हारे दुःख जिसे ज्ञात न हों उससे उन्हें मत कहो, और न
अपने शत्रु से अपनी निर्बलता।
८७८. नियमानुसार बल प्राप्त करके अपनी सुरक्षा कर ली जाय तो
शत्रु के अहंकार का स्वतः नाश हो जायगा।
८७९. काँटेदार वृक्ष को छोटा रहते ही काट फेंको, अन्यथा वह बढ़
गया तो काटनेवाले के हाथ का ही अन्त कर देगा।
८८०. शत्रु के अहंकार को जो त्रस्त नही कर पाता, उसे जीवित
रहने पर भी मृत ही समझो।
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