तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ८७ तिरुक्कुरळ 199
८७. शत्रुता की उग्रता
८६१. अपने से बलवान का सामना न करो; निर्बल पर शत्रुता
निरन्तर बनाये रखो।
८६२. स्थाई आश्रय तथा निज बल से रहित स्नेहहीन व्यक्ति शत्रु के
बल को कैसे मिटा सकता है ?
८६३. डरपोक, बुद्धिहीन, असम्बद्ध तथा निर्दय व्यक्ति शत्रु के लिए
निर्बल व अति साधारण होता है।
८६४. जो क्रोध को नहीं छोड़ता और मन में सन्तुलन नहीं रखता
वह सभी काल, स्थान व व्यक्ति के लिए अति साधारण व
सहज-सुलभ होता है।
८६५. सन्मार्ग को न देखनेवाला, अवसर पर कर्म न करनेवाला,
दोष पर ध्यान न देनेवाला दुराचारी व्यक्ति शत्रुओं के लिए
भला होता है।
८६६. बिना समझे क्रोधित होनेवाले अति तीव्र कामी की शत्रुता
जान-बूझकर मोल लेनी चाहिए।
८६७. साथ रहकर असन्तुलित कार्य करनेवाले की शत्रुता कुछ देकर
भी प्राप्त करनी चाहिए।
८६८. गुणहीन व अनेक दोषों से युक्त व्यक्ति शत्रु के लिए निराश्रय
होता है, और यही स्थिति शत्रुओं के लिए सहायक भी
होती है।
८६९. बुद्धिहीन व डरपोक शत्रु मिलें तो उनके शत्रुओं से श्रेष्ठ सुख दूर
नहीं ठहरे रहेंगे।
८७०. अनपढ़ से शत्रुता उत्पन्न कर लेने की लघु क्षमता न होनेवाले
के पास यश भी कभी नहीं पहुँचता।