तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
पृष्ठ 222, कुल 334 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ८६ तिरुक्कुरळ 197
८६. विरोध
८५१. सभी जीवों में बैर भाव के दुराचरण की वृद्धि करनेवाले
ज्वर को विरोध कहते हैं ।
८५२. सहमत न होने के फलस्वरूप किसी के अनिष्ट करने पर भी,
विरोध के कारण उसे दुखित न करो ।
८५३. विरोध नामक दुखद् ज्वर को हटा दें तो वह अमिट व
निर्दोष यश प्रदान करेगा ।
८५४. दुखों में (सब से भयंकर) विरोध नामक दुःख का नाश हो
जाय तो सुखों में (सब से श्रेष्ठ) सुख की प्राप्ति होगी ।
८५५. विरोध के प्रभाव से हटकर कर्म करने की शक्ति जिसमें
हो, उस पर विजय प्राप्त करने की शक्ति किस में हो
सकती है ?
८५६. विरोध की जीत को मधुर माननेवालों का जीवन शीघ्र ही
सदोष व नाशमान होगा ।
८५७. विरोध से युक्त दुर्बुद्धिवाले व्यक्ति को वृद्धि-सम्पन्न तत्वार्थ के
दर्शन असम्भव हैं ।
८५८. विरोध के सामने से हटना ही विकासप्रद होता है, और
उसी को बढ़ाते गये तो नाश विकसित होता जाता है ।
८५९. वृद्धि का समय आवे तो व्यक्ति विरोध को नहीं देखता;
पतनोन्मुख करने के लिए उसी का बढ़ा हुआ रूप उसे
दृष्टिगोचर हो जाता है ।
८६०. विरोध से सभी दुःख आ पड़ते हैं; सौहार्द से शुभ नीति
नामक सम्पत्ति की सम्प्राप्ति होती है ।