तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ८५ तिरुक्कुरळ् 185
८५. अहंकारयुक्त तुच्छ बुद्धि
८४१. अभावों में अभाव है बुद्धि का अभाव । दूसरे अभावों को
संसार अभाव नहीं मानता ।
८४२. बुद्धिहीन के प्रसन्न मन से कुछ देने का कारण और कुछ
नहीं है । प्राप्त करनेवाले का सौभाग्य ही है ।
८४३. बुद्धिहीन स्वयं बाधा-स्वरूप होकर अपने लिए जितनी हानि
पहुँचाता है उतनी शत्रु भी उसे नहीं पहुँचा सकते ।
८४४. बुद्धिहीनता कहते हैं उस निश्चितता को जो इस भावना से उत्पन्न
होती है कि हम बुद्धिमान हैं ।
८४५. जिसका अध्ययन न हो उस पर अपना अधिकार व्यक्त करना
उसके खूब अध्ययन किये हुए विषयों पर भी दूसरों में सन्देह
उत्पन्न करेगा ।
८४६. अपने दोषों को छिपा न पाने पर (वस्त्र से) उन्हें छिपाने का
प्रयत्न करना ही, क्या बुद्धिहीनता है ?
८४७. अति रहस्यपूर्ण विषयों की रक्षा किये बिना उन्हें व्यक्त कर
डालनेवाला बुद्धिहीन अपने लिए स्वयं अत्यधिक हानि उत्पन्न
कर लेगा ।
८४८. जो समझाने पर भी न करे और स्वयं भी न समझे वह
प्राण विसर्जन तक एक व्याधि ही बना रहेगा ।
८४९. बुद्धिहीन को समझानेवाला स्वयं नहीं समझ पावेगा । बुद्धिहीन
अपनी बुद्धि के अनुसार ही समझेगा ।
८५०. लोग जिसे उपस्थित कहते हैं उसे अनुपस्थित कहनेवाला संसार में
प्रेत समझा जायगा ।