तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ८४ तिरुक्कुरळ् 193
८४. मूढ़ता
८३१. मूढ़ता एक वह (दुर्गुण) है जो हानिप्रद को ग्रहण करके
लाभप्रद को छोड़ बैठता है।
८३२. मूढ़ताओं में सब से बड़ी मूढ़ता है सदाचरण के प्रतिकूल
कर्म की अभिलाषा करना।
८३३. निर्लज्जता, लापरवाही, निर्दयता, किसी को साध कर न रखना—
ये हैं मूढ़ के व्यवहार।
८३४. अध्ययन, मनन एवं अध्यापन के पश्चात् भी स्वयं उसके
अनुकूल आचरण न बरतनेवाले मूढ़ के समान और कोई
मूढ़ नहीं होता।
८३५. मूढ़ एक ही जन्म में सात जन्मों की नरक वेदना का
अधिकार अपने लिए सृजन कर लेने की क्षमता रखता है।
८३६. सदाचरण को न जाननेवाला मूढ़ यदि किसी कर्म को उठावेगा
तो वह अपूर्ण ही रह जायगा, अन्यथा उसके हाथों में
बेड़ी चढ़ेगी।
८३७ मूढ़ को अधिक सम्पत्ति प्राप्त हो तो उसके अपने तो भूखे
रहेंगे और दूसरे लाभान्वित होंगे।
८३८. मूढ़ के हाथों कोई वस्तु लगे तो उसकी अवस्था उसके समान
होगी जो पीकर मस्ती में रहता है।
८३९. मूढ़ के साथ मित्रता बड़ी मधुर होती है। वह टूटने पर
कोई दुःख नहीं देती।
८४०. मल लगे पैर को धोये बिना शयन पर रखने के समान होता है
बुद्धिमानों के संघ में मूढ़ का प्रवेश।