तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
पृष्ठ 208, कुल 334 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७९ तिरुक्कुरळ 183
६. मैत्री
७९. मित्रता
७८१. मित्रता के समान अद्भुत कर्म कौन-सा है, और उसके समान
कर्म का अनुपम रक्षक भी कौन है ?
७८२. बुद्धिमानों की मित्रता बढ़ते हुए बालचन्द्र के समान, तथा
मूर्खों की मित्रता घटते हुए पूर्णचन्द्र के समान होता है ।
७८३. अधिकाधिक अध्ययन के साथ जिस प्रकार काव्य-सौष्ठव के
रसाद्बोधन में वृद्धि होती जाती है, उसी प्रकार अधिकाधिक
सम्पर्क में आने पर सज्जनों की मित्रता भी अधिक आनन्दप्रद
होती जाती है ।
७८४. मित्रता का उद्देश्य हँस कर आनन्दित होने के लिए नहीं, अपितु
सीमोल्लंघन होने पर आगे बढ़कर डांटने के लिए है ।
७८५. सम्बन्ध व सम्पर्क नहीं, अपितु भावावेग ही मित्रता का
अधिकार प्रदान करता है ।
७८६. मुख को ही हँसानेवाली मित्रता कोई मित्रता नहीं है ; हृदय को
आनंदित करनेवाली मित्रता ही मित्रता है ।
७८७. (मित्र के) विनाशकारी तत्त्वों को हटाकर अच्छे मार्ग में लाते
हुए, विनाश काल में उसके साथ दुखित होना ही
मित्रता है ।
७८८. (ओढ़े हुए) वस्त्र के खुलने पर हाथ के तुरन्त वहाँ पहुँचने के
समान मित्र के दुःख का तुरन्त निवारण करना मित्रता है ।
७८९. मित्रता की महत् अवस्था है कभी विलग न होना, और
यथासम्भव सहायता करते रहना ।
७९०. 'मेरे ये मित्र ऐसे सहायक हैं और हम उनके ऐसे हैं'—इस
प्रकार यदि गौरवान्वित करते हुए कह भी डाला तो मित्रता की
महिमा मन्द पड़ जाती है ।