तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७८ तिरुक्कुरळ 181
७८. सैन्य-शौर्य
७७१. मेरे सेनापति के सम्मुख न डटो; उनके सम्मुख डट कर अनेक
पत्थर बन चुके हैं।
७७२. जंगली खरगोश पर अचूक बाण प्रहार करने की अपेक्षा हाथी पर
चूकते हुए भी भाला प्रयोग करना श्रेयस्कर है।
७७३. शत्रु पर की गयी निर्दयता को महान पौरुष कहते हैं। उन पर
कोई दुःख आ पड़ने पर उनकी सहायता करना उस पौरुष की
प्रखरता है।
७७४. (विकट युद्ध के समय) अपने हाथ के भाले को हाथी पर प्रहार
करके लौटनेवाला वीर (शत्रु पर प्रहार करने के लिए) अपनी
छाती पर चुभे हुए भाले को प्राप्त करके प्रसन्न होता है।
७७५. शत्रु को सरोष देखते हुए (निर्निमेष) नेत्र उसके शूल
प्रयोग पर बन्द होते हुए झपकें तो, क्या वह शूरवीर की
हार नहीं है ?
७७६. (वीर अपने गत दिवसों की गणना करते हुए) जिन दिनों में
शरीर पर बड़े घाव न लगे हों, उन्हें व्यर्थ मानकर हटाकर
रख देता है।
७७७. स्थाई विशद प्रशंसा के निमित्त जीवन को तुच्छ माननेवाले
योद्धा के पैर में कड़े आभूषण सदृश हैं।
७७८. प्राण त्याग से निर्भीक योद्धा सम्राट् के क्रुद्ध होने पर भी अपनी
वीर प्रतिष्ठा में कमी न आने देंगे।
७७९. प्रतिज्ञात कर्म को पूर्णतः करके (आवश्यकता हो तो)
मरण के लिए भी प्रस्तुत रहनेवाले वीर के दोषों का विचार
कौन करता है ?
७८०. अपने सम्राट् के नेत्रों में भी अश्रु लानेवाली मृत्यु प्राप्त हो तो
वह मृत्यु वस्तुतः मर कर भी प्राप्त करने योग्य है।