तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७४ तिरुक्कुरळ 178
३. दुर्ग
७४. राज्य
७३१. अक्षय उपज, योग्य विद्वान तथा क्षतिहीन धनवान से युक्त होवे
तो वही राज्य होता है ।
७३२. विशाल सम्पत्ति के फलस्वरूप दूसरों के लिए आकर्षक, विनाश
रहित तथा विशद उपजप्रद हो तो वही राज्य होता है ।
७३३. विभिन्न भार एकत्रित हो आ पड़ने पर उसका सहन करते हुए
(प्रजा-वर्ग) अपने सम्राट् को भी यथानुसार समस्त कर चुकाता
रहे तो वही राज्य होता है ।
७३४. क्षुधाधिक्य, निरन्तर व्याधि तथा बाह्याक्रमणों से मुक्त हो तो वही
राज्य होता है ।
७३५. अनेक (विरोधी) संघ-सभाएँ, विनाशकारी अन्तःकलह तथा
राजा के लिए दुःखप्रद हत्यारे भूस्वामी न हों तो वही राज्य
होता है ।
७३६. (शत्रुओं से) क्षतिग्रस्त न होकर, विनाश काल में भी समृद्धि में
क्षति न आने देनेवाला राज्य ही राज्यों में श्रेष्ठ होता है ।
७३७. (सोता और वर्षा रूपी) जल के उभय स्रोत, यथानुकूल पर्वत,
प्रवाहपूर्ण नदी तथा सुदृढ़ दुर्ग राज्य के अनिवार्य अंग हैं ।
७३८. व्याधि रहित अवस्था, सम्पत्ति, उपज-समृद्धि, सानन्द-जीवन तथा
सुरक्षा—ये पाँचों राज्य के अलंकार कहे जाते हैं ।
७३९. निष्प्रयास स्वयं समृद्ध हो तो वही राज्य कहलाता है ।
सप्रयास समृद्ध होनेवाले राज्य वस्तुतः श्रेष्ठ राज्य नहीं हैं ।
७४०. उपर्युक्त रूप में अवस्थित होने पर भी राज्य का एक श्रेष्ठ
राजा न हो तो वह सब व्यर्थ ही सिद्ध होगा ।