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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 334 में से

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पृष्ठ 196

अध्याय ७३ तिरुक्कुरळ् 171
७३. सभा में निर्भीकता
७२१. शब्दों के क्रम की शक्ति का स्पष्ट ज्ञान रखनेवाले सभा की
रीति को हृदयंगम करके विद्वानों के मध्य अपने मुख में
अनुचित शब्द न आने देंगे ।
७२२. विद्वानों के सम्मुख अपने अध्ययन को प्रभावोत्पादक ढंग से
कहने की शक्ति जिनमें हो वे विद्वानों में विद्वान कहलायेंगे ।
७२३. शत्रुओं के संग्राम-क्षेत्र में (सोत्साह) समाप्त होनेवाले तो अनेक
होंगे, परन्तु विद्वत् सभा में निर्भीक रहनेवाले विरले ही होंगे।
७२४. विद्वानों में स्वाध्ययन का प्रभाव अपने भाषण से उत्पन्न करके
अपने से श्रेष्ठ विद्वानों से अन्य विषयों का अध्ययन कर लेना
चाहिए ।
७२५. सभा में निर्भीक रूप से प्रत्युत्तर देने के हेतु नियमपूर्वक
तर्क-शास्त्र का सतर्क अध्ययन आवश्यक है ।
७२६. निडर वीर के अतिरिक्त औरों का खड्ग से क्या सम्बन्ध !
विद्वत् सभा से डरनेवाले का सद् ग्रन्थों से क्या सम्बन्ध !
७२७. सभा में डरनेवाले के हाथ में सद् ग्रन्थ वैसा ही होता है जैसे
शत्रु से संग्राम-क्षेत्र में डरनेवाले के हाथ में तलवार ।
७२८. अनेकानेक ग्रन्थों का अध्ययन उनके लिए निष्प्रयोजन ही
होता है जो विद्वत् सभा को अपने भाषण से प्रभावित
न कर सकें ।
७२९. विद्याध्ययन के अनन्तर भी विद्वत् सभा से भयभीत होनेवाले
वेपढ़ों से भी बदतर हैं ।
७३०. सभा से भयभीत हो अपने अध्ययन का प्रभाव जो श्रोताओं में
न उत्पन्न कर सकें वे सप्राण होते हुए भी निष्प्राण
सदृश ही हैं ।