तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७२ तिरुक्कुरळ 169
७२. सभा को समझना
७११. शब्दों के क्रम की शक्ति का स्पष्ट ज्ञान रखनेवाले सभा को
समझकर ध्यान से शब्दों का व्यवहार करें।
७१२. शब्दों की शैली से अवगत ज्ञान-सम्पन्न व्यक्ति को चाहिए कि
श्रोताओं के श्रवण की अभिलाषा को स्पष्टतः समझकर शब्दों का
व्यवहार करें।
.७१३. सभा को समझे बिना शब्दों के व्यवहार की ओर अग्रसर
होनेवाले शब्दों की रीति से अनभिज्ञ ही होते हैं, और कथन
योग्य विषय भी उनके पास नहीं होता।
७१४. बुद्धिमान के सम्मुख बुद्धिमान जैसे ही सम्भाषण करो, और
बुद्धिहीन के सम्मुख सफेद चूने के समान ही बन जाओ।
७१५. श्रेष्ठ बुद्धिवन्त के सम्मुख बढ़कर सम्भाषण न करने का संयम
मनुष्य के प्रयोजन-सम्पन्न विषयों में प्रधान है।
७१६. विशद् ज्ञान-क्षेत्र के विद्वानों के सम्मुख सदोष सिद्ध होना
सदाचरण की स्थिति में विघ्न पड़ जाने के समान है।
७१७. विशुद्ध रूप से शब्दों के भाव को समझनेवाले विद्वान के
सम्मुख ही (अनेक ग्रन्थों के) अध्ययन-सम्पन्न व्यक्ति की
विद्या प्रकाशित होगी।
७१८. अच्छी बुद्धिवाले व्यक्ति के सम्मुख बोलना विकसित होती हुई
कृषि को जल से सिंचित करने के समान है।
७१९. श्रेष्ठ विद्वानों की सभा के प्रभावोत्पादक वक्ता मूर्खों की सभा में
भूलकर भी न बोलें।
७२० स्वजन से रहित सभा में किसी विषय पर बोलना स्वीकार न
करो; अन्यथा वह अशुद्ध आँगन में गिराये गये अमृत के
समान होगा।
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