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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 334 में से

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पृष्ठ 182

अध्याय ६६ तिरुक्कुरळ 157
६६. व्यवहार-विशुद्धि
६५१ (वाह्य) सहायता मनुष्य को श्रीवृद्धि प्रदान करती है, पर
(व्यक्तिगत) व्यवहार-विशुद्धि सकल आवश्यक पदार्थों को
प्रदान करती है ।
६५२. सुयश के साथ जो व्यवहार सद्धर्मप्रद् भी न हो उसे सदा
के लिए त्यागना चाहिए ।
६५३. उत्तरोत्तर विकास के इच्छुक सुयश में बाधा उपस्थित करनेवाले
कर्मों को त्यागें ।
६५४. निश्चल बुद्धिवाले विपद्ग्रस्त अवस्था में भी निन्द्य व्यवहार
न करेंगे ।
६५५. पश्चात्ताप-जनक व्यवहार न करें, और यदि कर बैठे हों तो
आगे से उससे बचे रहना अच्छा है ।
६५६. जननी को क्षुधाग्रस्त भी क्यों न देखना पड़े, विद्वज्जनों से
दोषारोपित होनेवाले व्यवहारों को मत करो ।
६५७. सदोष तुच्छ व्यवहार से प्राप्त समृद्धि से विज्ञ जनों के लिए
अत्यधिक निर्धनता ही श्रेष्ठ है ।
६५८. त्याज्य व्यवहारों का बहिष्कार किये बिना उनमें प्रवृत्त
होनेवाले को, सफल होने पर भी, वे दुःख ही देंगे ।
६५९. दूसरों को रुलाकर प्राप्त की हुई सम्पूर्ण सम्पत्ति रो कर
खोनी पड़ेगी । सद्व्यवहार से संचित सम्पत्ति खोने पर भी
भविष्य में लाभप्रद् होगी ।
६६०. वंचना से धन संग्रह कर उसकी रक्षा करना, कच्चे घड़े में जल
भर कर उसकी रक्षा करने के समान होता है ।