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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 334 में से

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पृष्ठ 180

अध्याय ६५ तिरुक्कुरळ 155
६५. वाक् शक्ति
६४१. वाक्पटुता नामक विशिष्ट गुण की शक्ति और किसी गुण-विशेष में
नहीं है ।
६४२. उससे विकास एवं विनाश दोनों प्राप्त होने के कारण अपने .
शब्दों पर सदा ध्यान रखना चाहिए ।
६४३. बोल वह है कि जो सुननेवाले को वशीभूत कर ले, और न
सुननेवालों में भी सुनने की इच्छा उत्पन्न कर दे ।
६४४. शब्द-शक्ति को समझकर शब्दों का प्रयोग करना चाहिए ।
धर्म और धन इससे श्रेष्ठ नहीं हैं ।
६४५. किसी शब्द का प्रयोग तब करो जब समझ लो कि दूसरा कोई
शब्द इस पर विजय प्राप्त नहीं कर पावेगा ।
६४६. प्रिय शब्द स्वयं कहकर दूसरों के शब्दों के प्रयोजन को
हृदयंगम करना निर्मल स्वभाववाले महान व्यक्तियों का
सिद्धान्त है ।
६४७. वाक्पटु, निरालस्य व निर्भीक व्यक्ति से विरोध करके उससे कोई
नहीं जीत सकता ।
६४८. विचारों को सजाकर मधुर ढंग से व्यक्त करनेवाला प्राप्त हो तो
संसार शीघ्र उसके आदेशों को सुनेगा ।
६४९. थोड़े से निर्दोष शब्दों में (अपने विचारों को) कहना जो
नहीं जानते वे वस्तुतः अनेक शब्दों को कहने के
इच्छुक होंगे ।
६५०. स्वयं अध्ययन किये हुए ग्रन्थों को दूसरों को समझाने की शक्ति
जिनमें नहीं होती वे गुच्छे के समान पुष्पित होने पर भी
गन्धहीन पुष्प के समान होते हैं ।